Sunday, 10 May 2015

"माँ" का "आई" होनेका सफर...

मातृदिन आत्ममंथन (दि. १० मई २०१५)
मनोरमा और केशवलाल
मारी माँ इंदोरसे है. माँका पिहर नंदानगरमेंहै. वहाँपर स्व. राममूर्ती वाजपेयीका परिवार था. आजभी मामांओंका है. शायद मैं ७/८ वी कक्षामे था जबतक हरवर्ष गर्मीयोंकी छुट्टीयोंमें माँके साथ इंदोर जाया करता था. मेरे ३ मामा अशोक, गिरीश तथा बब्बू, मुकेश और ३ मौसी बेबी, अनिता और रेखा है. नानीजीभी है. माँसे छोटीवाली बेबीमौसीसे हमे ममत्व था. मौसी कभी कभार कही सिटीमेंजाए तो मुझे साथ लेकर जाती थी. मौसीकी भरकुँआवाली एक सहेली का किस्सा आजभी हसहसकर सुनाया जाता है. उमरमे लगभग साथवाली अनिता और रेखा मौसी थे. हम बहूतही मस्ती करते थे. नानी चिल्लाती थी. माँको बोलतीथी "बडीमुन्नी तेरे छोरे बडे बंड है. तेरा भाग्य कुछ अच्छा नही"
मनोरमा, नानी (इंदोर), केशवलाल
इंदोरमें मेरा पेटनेम "काठी" था. कहते है मै छोटा था तो काठी लेकर खेलता था. जुनीइंदोरवाले सतिश मिश्रा मामाने काठी यह संबोधन मुझे दिया था. इंदोरकी और एक कहानी मेरा पिछा नही छोडती. वो है, नानाके घरमे उपर रखे बिस्किटकी बरनी और उसे देखकर मैने सुनायी हुई कौएँ की लम्बी कहानी.

मै १०/१२ वीमें गया. बादमें औरंगाबाद स्कूल आफ आर्टसे बीएफ हुआ. नौकरी की व्यस्ततासे हमारा ममेरा छूटसा गया. माँ और हमारे पिताजी तथा बापू जब समय मिले इंदोर हो आते थे. आजभी जाते है. जैसे मैंने नानीके शब्दोंमे उपर लिखा माँ इंदोरके घरमे बडीमुन्नी थी. सबसे बडी. पप्पासे शादी हुई और माँके जिंदगीने दो मोड लिए. पहलातो शहरकी जिंदगीसे कोसो दूर गांवकी जिंदगीमें माँ भडगाव पहुँची और दुसरी बात ये थी के महाराष्ट्र का खान-पान और लिहाज आलगथलग था. भडगावके तिवारी घरानेमें सास शांताबाई, ससूर भाऊलाल, पती केशवलाल, चार देवर रमेश, प्रकाश, जवालरलाल और शेखर और पाँच नंदे मथुरा, निर्मला, सुशिला, सरला ऐसा भरापुरा परिवार था. नंदानगरमें दिन कोयलेकी सिगडीपे सुरू होता या केरोसिनवाला स्टोव्ह था. भडगावमें तिवारी परिवार खेतीबाडीवाला था. दिन चूल्हेके धूएँसे शुरू होता और लकडीके राखवाली ढेरमें समाप्त हो जाता.

मथुरा, दुर्गा, निर्मला ये माँकी समवयस्क नंदे थी. काममें हात बटानेवाली. सुशीला और सरलाभी थी. माँ और दो नंदे रोज १० बजे सरपर कपडेकी गठहरी लेकर गिरनापे धोने जाते थे. उस वक्त नदीमें बारामास पानी रहता था. माँको यह अनुभव नया था. एक बातका समाधान था. दादाजीने घरके बाहर शौचालय बना रखा था. फिरभी सुबह गल्लीकी औरते नदीके किनारे प्रातः विधीके लिए जाती तो माँको अटपटा लगता. चारो देवर रमेश, प्रकाश, जवाहर और शेखरभी उम्रमे आगेपिछे थे. वोभी भौजी भौजी कहकर काममें हात बटाते थे.

माँके मैकेमे कभी ज्वार- बाजराकी भाकरी नही बनती थी. लेकीन भडगावमे रोज शाममें भाकरी बनती थी. चूल्हे का धुँआ और जाडीवाली बडीवाली भाकरी बनाना बडाही असंभवनीय कार्य माँकेलिए था. लेकिन मेरी तीनो, चारों बुआजीने माँको सारी बाते सिखायी.

मै आजभी माँसे घरकी बातेंकरता हूँ तो माँ मेरी सभी बुआंओंका आदरपूर्वक संबोधन करती है. माँको मथुराबुआका बडा आधार था. इसका कारण यहभी है के पिताजी केशवलाल और मथुरा ये घरके हालातको बेहतर जानते थे. मथुराबुआ आजभी पिताजीको केशव तू मिलने आ और माँको भौजी आवो ऐसा बडे हट्टसे कहती है. निर्मला बुआभी माँको भौजी भौजी करती थी. आज ये बुआ गलेके भितरी बिमारीके कारण हमसे बोल नही पाती.

चार देवर और पाच नंदेके परिवारकेबिच माँका बडीभौजी बननेका सफर बडाही रोचक रहा. जीवनके सारे रस, आनंदके क्षण माँ ओर पिताजीने व्यतित किये. हम बच्चे मै दिलीप, शैलेश, योगिता और अरविंदभी आस्तित्वमें आए. वैसे मे बहुत भाग्यशाली हूँ. तिवारी परिवारमें मैं बडेपूत्रका बडा पौत्र हूँ. इसलिए बचपनका सारा लाडप्यार मैंने चाचा और बुआंओंसे वसूल किया है.
बचपनमे मेरी बिगडी हुई आदत थी. मैं माँसे झगडता था और कभीकभार बुरे शब्द बोलकर कुछ चिज फेकर मार देता था. कहते है, एकेला और पहला नाती होनेकी वजह कुछ आदते बिगडी हुई थी. हमारे पिताजीके ममेरे भाई सुरेश मिसर है. वो हमे अंग्रेजी पढाते थे. ५ वी कक्षाके प्रधान शिक्षक थे. माँने मेरी आदतके विषयमें सुरेशचाचासे बात करी. और एक दिन चाचाने पुरी क्लासमे मेरी हरकतोंका उल्लेख कर दिया. में निचे मूँह लटकाये दिनभर चूपचाप था. शायद उसके बाद हरकते कम होती गयी.

हमारे तिवारी परिवारमें खेतीबाडी होनेसे नोकर, चाकर और खेतमें काम करनेवाले भिल्ल रखवालदारोंका आनाजाना लगा रहता. हमारी दादी शांताबाई कर्मठ विचारोंवाली थी. शक्कर कुलूप बंद रखती थी. अगर दोपहरमें कोई आगंतूक आए तो दादीको शक्करके लिए ढुंढना पडता था. हां लेकिन दादी मेरेसाथ सभी पोतोंको प्रेम करती थी. दादाजींने बडीबहू होनेका पुरा सम्मान माँको दिया. एकत्र कुटूंब पध्दतीके अच्छे दिन हमने एक साथ आनंदसे गुजारे हे. कुछ कटूपल अतितमें दफाना दिए है.

घरमें आनेवाला कोईभी दादीको "मोठी माय" पुकारता था. हमारी माँ "बडेभौजी" थे. पिताजीको सभी "भय्या" कहते तो हम बच्चेभी भय्याही कहते थे. दादाजीके जिंदा होनेतक माँ बडेभौजीही थी. हमारी माँके मिलनसार स्वभावने बडेभौजीका सफर "आई" होनेके दिशामें दादीके स्वर्ग सिधारनेकेबाद शुरू हुआ. वेसे दादीकी मोठमाय उपाधी माँको परंपरागत रूपसे मिली. लेकीन गाँवकुचेंमे "माय" और "आई" शब्दका ममत्व आंतरिक रूपसे गहरा और भावनाशील है. वैसेतो मै और शैलेश, योगिता, अरविंद और हमारे चारही चाचाके बच्चे माँको भौजीही बुलाते थे. दादीके बाद माँ पहले मोठमाय हुई. मोठमाय यह संबोधन आदरार्थी और अधिकारवाला है. रिश्तो और पहचानको मर्यादाका भान देता है. माँका सफर मोठमायसे "आई" होनेमें है. ताज्जूबवाली बात यही है के १०/१२ सालमें माँ पुरे दत्तमंदिर गलीमें अब आई संबोधनसे जानी जाती है. हम सब अब आई पुकारते है.

माँके आई होनेमें मेरी चारो चाचीओंका योगदान महत्त्वपूर्ण है. उर्मिला, लता, रजनी और विद्या ये चाची भरेपुरे परिवारमेंमेरी शादी होनेतक साथमेंही थे. माँको बडीबहू होनेका पुरा मानसन्मान इन चाचीओंने दिया. अलगअलग परिवारकी ये लडकिया बहूँए होनेपर एकसाथ रही. मैने कभी माँ और चाचीओंके आपसमें उंची बात करते नही सूना. मै इन सभी महिलांओका आदर करता हूँ. सभी चाचीओंको हसाना मेरा काम था. हम लोग आपसमें इतने घुलमिल गऐ थे के दादी शक्कर कुलूपमें रखती तो हम प्रायवेट खरीद लाते और दादीके बाहर जाते चाय बनाते. हमने परिवारकेलिए बरतनभी खरेदे थे.

वैसे तो हम हिंदी भाषक है फिरभी माँका उच्चारण हम मराठी आईसे करते है. मुझे लगता है यही संस्कृती और संस्कार स्वीकार्यहता है. अब पुरा परिवार माँको आई पुकारता है. शैलेश १२/१५ सालसे आमरिकामें है. फोन या मोबाईलपर वोभी आईको दे कहता है. पिताजी आजभी हमारेलिए बापू है. माँका आई होनेका सफर ये ऐसा है. शायद, घर- परिवारमें शैलेशनेही सर्वप्रथम माँको आई कहकर पुकारा है.

मै एक बात स्पष्ट रूपसे कहूँगा, मै आईका आज्ञाकारी बन नही पाया हूँ. नाही मानसन्मानके पल जादा दे पाया हूँ. मैने बहूतबार गलतसलत कहा है. लेकिन मैं अपनी माँ और बापू (पिताजी) से आदरपूर्वक प्रेम रखता हूँ. आई आजभी मेरी हरकतोंको क्षमाशील दृष्टीसेही देखती है.

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